Posted by: Manu on: February 8, 2009
उनकी मु्स्कराहट, हमारे मासूम नतीजे,
थी जन्नत की चाहत, मिले दोजख के छींटे |
और लोग कहते खुदगर्जी इसे, खुदा देखता है……
गर ना हम होते शायर, तो अच्छा था,
दास्तान-ऐ-आशिकी तो न यूँ बयाँ करते |
छुपाने से जो चुप जाए वो मोहब्बत क्या है…………
मनु
February 9, 2009 at 9:07 AM
wah, b’ful