Posted by: Manu on: February 8, 2009
उनकी मु्स्कराहट, हमारे मासूम नतीजे,
थी जन्नत की चाहत, मिले दोजख के छींटे |
और लोग कहते खुदगर्जी इसे, खुदा देखता है……
गर ना हम होते शायर, तो अच्छा था,
दास्तान-ऐ-आशिकी तो न यूँ बयाँ करते |
छुपाने से जो चुप जाए वो मोहब्बत क्या है…………
मनु
Posted by: Manu on: July 28, 2008
कुछ लम्हें त्रिवेणी के साथ………
समेटी है आज कुछ बिख्ररी यादों की कतरने,
कुछ मीठे सपनो की रातें, मु्स्कराहटों का कोना |
शब की दहलीज पर ढूढां करता हूं, रोशनी मैं…..
दिल की दीवारों का भी है अजब आलम,
परतें उखड़ती हैं पर रंग उतरता ही नही |
इस घर के दरवाजे पर ताला जो लगा है…….
मीठी सुबह मै उड़ती ये [...]
Posted by: Manu on: May 25, 2008
कुछ और त्रिवेणीयाँ….
उनकी फिराक का ही तो हैं ये असर,
कि जा पहुचें हैं उनके और करीब |
शुक्र फासिल का मनायें तो क्या गलत है…
unki firaaq ka hi to hai yeh asar
ki ja pahunche hai unke aur kareeb
sukr faasil ka manay to kya galat hai…
हर दामन-ऍ-मिज्गा मै दर्द की आह है,
कहीं छुपी हुइ तो कही बेपरदा [...]
Posted by: Manu on: April 25, 2008
जो कहते हैं पत्थर हमेँ…..
कुसूर उनका नहीँ, सोच है…..
हमने तो जमाना देखा है…..
मनु
## Picture by Manu
Posted by: Manu on: February 26, 2008
कुछ और त्रिवेणीयाँ….
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तेरी साजे-ए-सरामदी का है ये असर,
कि पऱछाईयाँ सोज-ए-निहाँ छटती ही नहीं |
जो बेपरवाह होते तो अ्चछा था………
tere saaj-e-saramadii ka hai yeh asar,
ki parchayeya soz-e-nihaan chatti hi nahi
jo be-parwaah hote to accha tha….
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खेलते रहे खेल इक खिलौने की माफिक,
जब हुई परवाह दे दी थी उसने मात |
शाम की ढ़लान पर उगता नही [...]
Posted by: Manu on: February 25, 2008
त्रिवेणी**
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पऱछाइ-ए-माजी से हर पल भागा फिरता ॅहू मैं,
बेखबर आज से तदबीऱे कल की करता ंहू मैं
भाव खाना ही इक सुकून हैं मत छीनो इसे……….
** Triveni is an innovative form of peotry which is a bit different from the usual forms like sher and ghazal. Unlike shers, the trivenis are written with three misra’s [...]
गुफ्तुगू ....